बर्लिन दीवार का पतन (1989)
1961 में बनी बर्लिन दीवार शीत युद्ध के विभाजन का प्रतीक थी। 1989 में इसके गिरने से जर्मनी का एकीकरण हुआ और पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभुत्व समाप्त हो गया। यह द्विध्रुवीयता के अंत की शुरुआत थी।
सोवियत व्यवस्था की प्रकृति
1917 की रूसी क्रांति से उत्पन्न सोवियत संघ समाजवादी विचारधारा, राज्य स्वामित्व और कम्युनिस्ट पार्टी के एकदलीय शासन पर आधारित था। यह स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी सुविधाएँ देता था, परंतु लोकतंत्र और स्वतंत्रता का अभाव था। रूस का वर्चस्व अन्य गणराज्यों में असंतोष पैदा करता था।
आंतरिक कमजोरियाँ
1970 के दशक से आर्थिक ठहराव, तकनीकी पिछड़ापन और उत्पादकता में कमी। हथियारों की दौड़, 1979 का अफगानिस्तान आक्रमण और पूर्वी यूरोप को सब्सिडी ने व्यवस्था पर भारी बोझ डाला। भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी से जनता असंतुष्ट हो गई।
गोरबाचेव के सुधार (1985–1991)
गोरबाचेव ने पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लासनोस्त (खुलापन) के सुधार लागू किए। इनसे लोकतंत्रीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, परंतु राष्ट्रवाद और अलगाववाद भी बढ़ा। 1991 में कम्युनिस्ट नेताओं का तख्तापलट विफल रहा और बोरिस येल्त्सिन लोकप्रिय नेता बनकर उभरे।
सोवियत संघ का विघटन (1991)
रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ के अंत की घोषणा की। कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स (CIS) का गठन हुआ। रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सोवियत सीट संभाली और परमाणु हथियारों का उत्तराधिकारी बना। कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा और लोकतंत्र व पूँजीवाद की ओर बदलाव शुरू हुआ।
विघटन के परिणाम
शीत युद्ध और समाजवाद–पूँजीवाद की वैचारिक लड़ाई का अंत हुआ। अमेरिका के नेतृत्व में एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभरी। लोकतांत्रिक राजनीति और बाजार अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव (शॉक थैरेपी) अक्सर विनाशकारी साबित हुआ। नए स्वतंत्र देशों में गृहयुद्ध और जातीय संघर्ष शुरू हो गए (जैसे चेचन्या, यूगोस्लाविया)।
भारत पर प्रभाव
भारत ने सोवियत संघ जैसा मज़बूत सहयोगी खो दिया, परंतु रूस के साथ विशेष संबंध बने रहे। रूस ने कश्मीर और रक्षा मामलों में भारत का समर्थन किया तथा हथियार, परमाणु व अंतरिक्ष तकनीक और ऊर्जा संसाधन उपलब्ध कराए। भारत-रूस सहयोग भारत की विदेश नीति का आधार बना और दोनों ने बहुध्रुवीय विश्व की परिकल्पना साझा की।