अध्याय 7: वैश्वीकरण
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (हिंदी, विस्तृत)
प्रश्न 1. वैश्वीकरण की परिभाषा दीजिए और इसके मुख्य लक्षण स्पष्ट कीजिए।
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विश्व के देश आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और तकनीकी रूप से परस्पर जुड़ते जा रहे हैं।
मुख्य भाग:
– वैश्वीकरण की विशेषताएँ:
1. वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी और विचारों का सीमाओं के पार प्रवाह।
2. संचार और परिवहन में तकनीकी क्रांति।
3. उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण।
4. बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक संस्थाओं (WTO, IMF) की भूमिका।
5. वैश्विक संस्कृति और मीडिया का विस्तार।
निष्कर्ष:
वैश्वीकरण ने दुनिया को आपस में जोड़ा है, लेकिन इसने असमानता और निर्भरता भी बढ़ाई है।
प्रश्न 2. वैश्वीकरण के आर्थिक आयाम की व्याख्या कीजिए।
प्रस्तावना:
आर्थिक वैश्वीकरण से तात्पर्य राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के वैश्विक स्तर पर जुड़ाव से है।
मुख्य भाग:
– उदारीकरण: व्यापार और निवेश पर सरकारी नियंत्रण कम करना।
– निजीकरण: सरकारी उपक्रमों को निजी क्षेत्र को सौंपना।
– IMF, विश्व बैंक और WTO जैसे संस्थान आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देते हैं।
– बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सस्ती श्रम शक्ति और बाज़ार के लिए निवेश करती हैं।
– भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों से वैश्विक प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई।
– परिणाम: GDP में वृद्धि, विदेशी निवेश, लेकिन असमानता में वृद्धि।
निष्कर्ष:
आर्थिक वैश्वीकरण ने विकास को गति दी, परंतु समानता और नियमन की आवश्यकता भी बढ़ी।
प्रश्न 3. वैश्वीकरण ने राज्यों की संप्रभुता को किस प्रकार प्रभावित किया है?
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण ने पारंपरिक राज्य संप्रभुता की अवधारणा को बदल दिया है।
मुख्य भाग:
– राज्य अब पूर्ण रूप से स्वायत्त नहीं रहे; उन्हें अंतरराष्ट्रीय नियमों और समझौतों का पालन करना होता है।
– अंतरराष्ट्रीय संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और NGO आंतरिक नीतियों को प्रभावित करते हैं।
– आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारियाँ आदि ऐसे मुद्दे हैं जिनके लिए वैश्विक सहयोग आवश्यक है।
– फिर भी राज्य सुरक्षा, कर नीति और सीमाओं पर नियंत्रण बनाए रखते हैं।
निष्कर्ष:
वैश्विक युग में संप्रभुता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप सहयोगात्मक और सहभागितापूर्ण हो गया है।
प्रश्न 4. वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण ने संस्कृतियों को गहराई से प्रभावित किया है, विशेषकर संचार, व्यापार और मीडिया के माध्यम से।
मुख्य भाग:
– सांस्कृतिक समानता (Homogenisation): पश्चिमी जीवनशैली, भोजन और मनोरंजन का प्रसार।
– सांस्कृतिक मिश्रण (Hybridisation): स्थानीय और वैश्विक संस्कृति का मेल — जैसे भारत में पनीर बर्गर या बॉलीवुड में पश्चिमी संगीत।
– वैश्विक मीडिया, फैशन और खेलों का विस्तार।
– स्थानीय पहचान और परंपराओं को बचाने के प्रयास भी हुए।
निष्कर्ष:
सांस्कृतिक वैश्वीकरण ने लोगों को जोड़ा भी है और पहचान को लेकर नए संघर्ष भी उत्पन्न किए हैं।
प्रश्न 5. 1991 के बाद भारत में वैश्वीकरण के प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
प्रस्तावना:
1991 में भारत ने आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की नीति अपनाई, जिससे वैश्वीकरण का नया दौर शुरू हुआ।
मुख्य भाग:
– आर्थिक प्रभाव: विदेशी निवेश में वृद्धि, IT और सेवा क्षेत्र का विकास, GDP वृद्धि।
– सामाजिक‑सांस्कृतिक प्रभाव: वैश्विक शिक्षा, मीडिया, मध्यम वर्ग का विस्तार।
– नकारात्मक प्रभाव: ग्रामीण‑शहरी असमानता, छोटे उद्योगों का नुकसान, पश्चिमीकरण।
– राजनीतिक प्रतिक्रिया: विकास के साथ सामाजिक न्याय व स्वदेशी उद्योगों की रक्षा।
निष्कर्ष:
भारत ने वैश्वीकरण से लाभ उठाया है, लेकिन इसे सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचाने की चुनौती बनी हुई है।
प्रश्न 6. वैश्वीकरण की प्रमुख आलोचनाओं पर प्रकाश डालिए।
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण को आर्थिक असमानता और सांस्कृतिक प्रभुत्व के लिए आलोचित किया जाता है।
मुख्य भाग:
– आर्थिक आलोचना: अमीर देश लाभान्वित, गरीब देश निर्भर हो गए।
– सांस्कृतिक आलोचना: पश्चिमीकरण से स्थानीय संस्कृति का ह्रास।
– राजनीतिक आलोचना: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वित्तीय संस्थाएँ राज्य शक्ति को कमजोर करती हैं।
– सामाजिक आलोचना: बेरोज़गारी और अमीर‑गरीब के बीच खाई।
निष्कर्ष:
वैश्वीकरण विकास लाता है, परंतु इसे न्यायसंगत और संतुलित बनाना आवश्यक है।
प्रश्न 7. वैश्वीकरण के विरोध में उभरने वाले वैश्विक प्रतिरोध आंदोलनों की चर्चा कीजिए।
प्रस्तावना:
कई सामाजिक आंदोलन वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों का विरोध करते हैं।
मुख्य भाग:
– WTO, IMF और G8 सम्मेलनों के विरुद्ध प्रदर्शन।
– विश्व सामाजिक मंच (World Social Forum) की स्थापना (2001) – वैकल्पिक विकास मॉडल का मंच।
– पर्यावरण, मानवाधिकार और असमानता के खिलाफ आंदोलन।
– उद्देश्य: लाभ‑केन्द्रित नहीं, मानव‑केन्द्रित वैश्वीकरण।
निष्कर्ष:
प्रतिरोध आंदोलनों ने यह संदेश दिया कि वैश्वीकरण को मानवता और पर्यावरण के हित में होना चाहिए।
प्रश्न 8. ‘सांस्कृतिक समानता’ और ‘सांस्कृतिक मिश्रण’ की व्याख्या कीजिए।
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण ने संस्कृतियों को प्रभावित करने के दो प्रमुख रूप दिए हैं — समानता और मिश्रण।
मुख्य भाग:
– सांस्कृतिक समानता (Homogenisation): विश्व भर में एक जैसी संस्कृति का प्रसार, जैसे पश्चिमी फैशन, संगीत, भोजन।
– सांस्कृतिक मिश्रण (Hybridisation): स्थानीय और वैश्विक संस्कृतियों का मेल, जैसे भारतीय फैशन में वैश्विक शैली।
– दोनों प्रक्रियाएँ साथ‑साथ चलती हैं और समाज को नया स्वरूप देती हैं।
निष्कर्ष:
वैश्वीकरण सभी संस्कृतियों को नष्ट नहीं करता, बल्कि उन्हें नए रूप में ढालता है।
प्रश्न 9. भारत ने वैश्वीकरण और राष्ट्रीय हितों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया है?
प्रस्तावना:
भारत ने वैश्वीकरण को स्वीकार करते हुए भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की है।
मुख्य भाग:
– मुक्त व्यापार का समर्थन लेकिन कृषि और लघु उद्योगों की सुरक्षा।
– WTO और जलवायु वार्ताओं में सक्रिय भागीदारी।
– विदेशी निवेश को बढ़ावा, पर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलें।
– विकासशील देशों के लिए न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की वकालत।
निष्कर्ष:
भारत की नीति संतुलित है — वैश्विक एकीकरण के साथ आत्मनिर्भरता को बनाए रखना।
प्रश्न 10. क्या वैश्वीकरण सभी देशों के लिए समान रूप से लाभकारी सिद्ध हुआ है?
प्रस्तावना:
वैश्वीकरण ने विश्व को जोड़ा है, पर इसके लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुँचे।
मुख्य भाग:
– विकसित देश तकनीकी व आर्थिक रूप से अधिक लाभान्वित हुए।
– भारत जैसे विकासशील देशों को मिश्रित परिणाम – विकास भी, असमानता भी।
– अफ्रीकी और गरीब देशों को सीमित लाभ।
– वैश्विक संस्थाओं के निर्णयों में अमीर देशों का प्रभुत्व।
निष्कर्ष:
वैश्वीकरण कुछ देशों के लिए अधिक लाभकारी रहा है; वास्तविक प्रगति के लिए इसे न्याय, समानता और स्थिरता पर आधारित बनाना होगा।