यह अध्याय प्रारंभिक भारतीय समाज की सामाजिक संरचना को समझाता है — जैसे कि परिवार, संबंध (कुटुम्ब), विवाह की परंपराएँ, जाति और वर्ग व्यवस्था।
मुख्य स्रोतों में महाभारत, धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र, वेद और संगम साहित्य शामिल हैं, जो समाज के मानदंडों और मूल्यों की झलक देते हैं।
1. ग्रंथों के माध्यम से सामाजिक संस्थाएँ
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प्रारंभिक भारतीय समाज के ज्ञान का मुख्य स्रोत संस्कृत ग्रंथ हैं — जैसे महाभारत, धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र।
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ये ग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचित हैं और समाज को उनके दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं।
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महाभारत एक नायक-काव्य से विकसित होकर एक विशाल सामाजिक-नैतिक ग्रंथ बना।
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यह ग्रंथ लगभग 1000 वर्षों (ई.पू. 500 से ई. 500 तक) में रचा गया और इसमें परिवार, जाति और लिंग संबंधी परिवर्तन प्रतिबिंबित हैं।
2. परिवार और गृहस्थ जीवन
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परिवार समाज की मूल इकाई था।
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पितृसत्तात्मक व्यवस्था (Patriarchy) प्रचलित थी — परिवार की वंशावली पिता की ओर से चली आती थी (पितृवंश / पितृरेखा)।
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संयुक्त परिवार का चलन था और सबसे बड़े पुरुष सदस्य को परिवार-प्रधान माना जाता था।
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परिवार में महिलाओं की स्थिति अधीन थी, परंतु कुछ मामलों में वे धार्मिक और आर्थिक कार्यों में भाग लेती थीं।
3. पितृवंश और उत्तराधिकार
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पितृवंश (Patriliny) की व्यवस्था से संपत्ति और सत्ता का उत्तराधिकार सुरक्षित रहता था।
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महाभारत की मुख्य कथा — कौरवों और पांडवों के बीच संघर्ष — उत्तराधिकार के झगड़े को दर्शाती है।
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पुत्र को पिता की संपत्ति का वारिस माना जाता था, जबकि पुत्रियाँ सामान्यतः वंचित रहती थीं।
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नियोग प्रथा के अंतर्गत संतानहीन पुरुष की विधवा को परिवार के भीतर संतान प्राप्ति की अनुमति थी ताकि वंश बना रहे।
4. विवाह की परंपराएँ और नियम
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विवाह एक धार्मिक कर्तव्य माना गया।
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मनुस्मृति में विवाह के आठ प्रकार बताए गए — जिनमें चार को श्रेष्ठ और चार को निंदित कहा गया।
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गोत्र की अवधारणा महत्वपूर्ण थी — एक ही गोत्र के पुरुष-स्त्री में विवाह वर्जित था।
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विवाह के बाद स्त्री अपने पति का गोत्र स्वीकार करती थी।
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उच्च वर्ग की स्त्रियों के विवाह अक्सर राजनीतिक गठबंधनों के रूप में भी होते थे।
5. सामाजिक भेदभाव और वर्ण व्यवस्था
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समाज चार वर्णों में बाँटा गया था —
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ब्राह्मण – यज्ञ, अध्ययन और शिक्षण
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क्षत्रिय – शासन और युद्ध
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वैश्य – कृषि, पशुपालन और व्यापार
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शूद्र – सेवा कार्य
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यह विभाजन धार्मिक रूप से औचित्यपूर्ण बताया गया, पर वास्तविक जीवन में यह इतना कठोर नहीं था।
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समय के साथ यह व्यवस्था वंशानुगत (hereditary) बन गई और जाति (Jati) प्रणाली का रूप ले लिया।
6. धर्मशास्त्र और शुद्धता-अशुद्धता की धारणा
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धर्मशास्त्र (विशेषकर मनुस्मृति) ने सामाजिक आचरण के नियम निर्धारित किए।
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समाज में शुद्धता और अशुद्धता का सिद्धांत प्रचलित हुआ।
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ब्राह्मणों को सबसे शुद्ध और शूद्रों व चांडालों को सबसे अशुद्ध माना गया।
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चांडालों को गाँव के बाहर रहने, मृत शरीर उठाने और गंदे कार्य करने के लिए बाध्य किया गया।
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फाह्यान और ह्वेनसांग जैसे यात्रियों ने वर्णन किया कि वे शहरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे।
7. महिलाओं की स्थिति
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स्त्रियाँ जीवन भर पुरुषों (पिता, पति, पुत्र) की अधीन रहती थीं।
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उन्हें केवल विवाह के समय मिले उपहारों पर अधिकार था, जिसे स्त्रीधन (Stridhan) कहा गया।
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संपत्ति में अधिकार बहुत सीमित था।
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फिर भी, महाभारत की कुंती, द्रौपदी जैसी स्त्रियाँ अपने विचार रखती थीं और धर्म पर प्रश्न उठाती थीं।
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कुछ रानियाँ, जैसे प्रभावती गुप्ता, भूमि-दान करती थीं, जिससे पता चलता है कि उच्च वर्ग की स्त्रियाँ कभी-कभी संसाधनों पर अधिकार रखती थीं।
8. ब्राह्मण परंपरा से परे – वैकल्पिक दृष्टिकोण
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सभी समाज ब्राह्मणीय नियमों का पालन नहीं करते थे।
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बौद्ध और जैन ग्रंथों ने जन्म-आधारित असमानता का विरोध किया।
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दक्षिण भारत और जनजातीय समाजों में मातृवंश और बहुपति-विवाह (Polyandry) जैसी व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं।
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संगम साहित्य से सामाजिक विविधता और स्थानीय परंपराएँ स्पष्ट होती हैं।
9. जाति, वर्ग और श्रम
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व्यवसाय धीरे-धीरे वंशानुगत हो गए।
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वैश्य व्यापार-कृषि करते थे, शूद्र और चांडाल सेवा-कार्य।
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दासता (Slavery) और बंधुआ मजदूरी मौजूद थी।
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आर्थिक संसाधनों पर अधिकार रखने वाले वर्गों ने ऊँची सामाजिक स्थिति प्राप्त की।
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इस प्रकार जाति के भीतर भी वर्ग-भेद (class differentiation) उभरने लगे।
10. इतिहासकारों का विश्लेषण
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आधुनिक इतिहासकार साहित्यिक, अभिलेखीय और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करते हैं।
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वे यह मानते हैं कि धर्मशास्त्र और महाभारत में वर्णित बातें आदर्श हैं, वास्तविकता नहीं।
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अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराएँ और प्रथाएँ भिन्न थीं।
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कुल मिलाकर, पितृसत्ता, वर्ण-व्यवस्था और आर्थिक विषमता ने मिलकर भारतीय समाज की रूपरेखा तय की।
🪔 मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaway)
ई.पू. 600 से ई. 600 के बीच भारतीय समाज पितृवंश, पितृसत्ता, जाति और वर्ग-आधारित असमानता से निर्मित था,
परंतु क्षेत्रीय विविधता और वैकल्पिक धार्मिक परंपराओं ने सामाजिक संतुलन और परिवर्तन की राह भी दिखाई।