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Geography
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Previous Year Paper – Class 12 RBSE 2025

 


🇮🇳 ⭐ SECTION D — निबंधात्मक प्रश्न (Hindi, ~250 शब्द)


18) “मानवाधिकारों की आवश्यकता वर्तमान समय में प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है।” उपरोक्त कथन की विस्तृत चर्चा कीजिए।

उत्तर (~250 शब्द):

मानवाधिकार आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार प्रदान करते हैं। आधुनिक समाज तेजी से बदल रहा है और इसके साथ शोषण, अन्याय, दमन तथा असमानता की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे में मानवाधिकार लोगों को राज्य, संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा होने वाले अत्याचार से सुरक्षा देते हैं।

पहला कारण यह है कि मानवाधिकार जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। आज भी दुनिया भर में हिंसा, भेदभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। दूसरा, वैश्विक समस्याएँ—जैसे प्रवासन, आतंकवाद, मानव तस्करी और डिजिटल निगरानी—मनुष्य की स्वतंत्रता को नई चुनौतियाँ देती हैं।

मानवाधिकार सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की भी रक्षा करते हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मानजनक जीवन और काम करने का अधिकार। बढ़ती आर्थिक असमानता के बीच ये अधिकार वंचित वर्गों—महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगों और अल्पसंख्यकों—को सुरक्षा और अवसर प्रदान करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ जैसे यूएन की मानवाधिकार घोषणा (UDHR) वैश्विक स्तर पर शांति और न्याय को बढ़ावा देते हैं। भारत जैसे देशों में संविधान के मौलिक अधिकार इन मूल्यों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं।

डिजिटल युग में डेटा सुरक्षा, ऑनलाइन शोषण और एआई जैसे नए खतरे मानवाधिकारों को और प्रासंगिक बनाते हैं। तकनीक का उपयोग मानव गरिमा को बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे कम करने के लिए।

इस प्रकार, मानवाधिकार एक न्यायपूर्ण, समान और लोकतांत्रिक समाज की नींव हैं और आज उनकी आवश्यकता पहले से अधिक है।


OR (वैकल्पिक प्रश्न)

सुरक्षा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा पारंपरिक और अपरंपरागत (Non-Traditional) सुरक्षा की व्याख्या कीजिए।

उत्तर (~250 शब्द):

सुरक्षा से तात्पर्य व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को उन सभी खतरों से बचाना है जो उनके अस्तित्व, सम्मान या कल्याण को प्रभावित करते हैं। सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह कई नए क्षेत्रों तक विस्तारित हो चुकी है।

पारंपरिक सुरक्षा:

पारंपरिक सुरक्षा राष्ट्र की सीमाओं, राजनीतिक संप्रभुता और सैन्य शक्ति से संबंधित है। इसमें माना जाता है कि खतरा किसी दूसरे देश से आता है, इसलिए सेना, हथियार, रक्षा गठबंधन और निवारण (Deterrence) रणनीतियों को प्राथमिकता दी जाती है। शीत युद्ध के दौरान सुरक्षा का यही दृष्टिकोण प्रमुख था।

अपरंपरागत सुरक्षा:

आज के समय में सुरक्षा को केवल सैन्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। गैर-पारंपरिक सुरक्षा में शामिल हैं:

  • आतंकवाद

  • पर्यावरणीय संकट (जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण)

  • मानव सुरक्षा (गरीबी, स्वास्थ्य संकट, महामारी)

  • साइबर सुरक्षा (हैकिंग, डेटा चोरी)

  • आर्थिक असुरक्षा (बेरोज़गारी, वित्तीय संकट)

  • प्रवासन और शरणार्थी संकट

ये खतरे व्यक्तियों को सीधे प्रभावित करते हैं और इन्हें केवल सेना से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और मानव-केंद्रित नीतियाँ आवश्यक हैं।

इस प्रकार आधुनिक सुरक्षा व्यापक है, जिसमें केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि लोगों का जीवन, स्वास्थ्य, अधिकार और भविष्य सुरक्षित करना भी आवश्यक है।


19) स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर (~250 शब्द):

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने अनेक गंभीर चुनौतियाँ थीं। पहली चुनौती थी राजनीतिक एकीकरण। भारत में 500 से अधिक रियासतें थीं, जिन्हें एक राष्ट्र में जोड़ना आवश्यक था। सरदार पटेल के प्रयासों से अधिकांश रियासतें भारत में विलय हुईं।

दूसरी बड़ी चुनौती थी विभाजन के कारण शरणार्थी संकट। लाखों लोगों को सीमा के दोनों ओर पलायन करना पड़ा। हिंसा, बेरोज़गारी, भोजन और आश्रय की कमी ने सरकार पर भारी दबाव डाला।

तीसरी चुनौती थी लोकतंत्र की स्थापना। व्यापक निरक्षरता, गरीबी और सामाजिक विविधता के बावजूद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित की। चुनाव आयोग को विशाल और निष्पक्ष चुनाव आयोजित करने थे।

चौथी चुनौती थी आर्थिक पुनर्निर्माण। औद्योगिक ढांचा कमजोर था, कृषि पिछड़ी हुई थी और संसाधनों की कमी थी। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र के विकास का प्रयास किया गया।

भारत में सामाजिक असमानताएँ—जैसे जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और साम्प्रदायिक तनाव—भी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ थीं। संविधान में मौलिक अधिकार और आरक्षण नीतियाँ इन्हें कम करने के लिए लागू की गईं।

क्षेत्रीय और भाषाई मांगें, विशेषकर राज्यों के भाषाई पुनर्गठन की माँग, भी चुनौती थीं, जिन्हें 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम द्वारा हल किया गया।

बाहरी चुनौतियों में रक्षा और सीमाई सुरक्षा, विशेषकर पाकिस्तान और चीन के साथ संघर्ष, शामिल थे।

इन सभी चुनौतियों के बावजूद भारत ने एक संयुक्त, स्थिर और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।


OR (वैकल्पिक प्रश्न)

भारत विभाजन के परिणामों का विस्तृत विवरण दीजिए।

उत्तर (~250 शब्द):

1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक था। इसका पहला प्रमुख परिणाम था मानव इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक पलायन, जिसमें लगभग 1 करोड़ से अधिक लोग भारत और पाकिस्तान के बीच स्थानांतरित हुए। इस पलायन के दौरान व्यापक हिंसा, हत्या, लूट और महिलाओं के खिलाफ अपराध हुए।

दूसरा प्रभाव था शरणार्थियों का पुनर्वास। भारत को लाखों विस्थापित लोगों के लिए भोजन, आवास, रोजगार और सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दिल्ली और पंजाब जैसे क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना पूरी तरह बदल गई।

विभाजन ने भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी तनाव पैदा कर दिया। कश्मीर विवाद उसी समय उत्पन्न हुआ और आगे चलकर 1947–48, 1965 और 1971 के युद्धों का कारण बना।

आर्थिक रूप से भी विभाजन ने भारी नुकसान पहुँचाया। कई औद्योगिक केंद्र भारत में रहे जबकि कुछ उपजाऊ कृषि भूमि पाकिस्तान चली गई। परिवहन, सिंचाई और प्रशासनिक ढाँचे बंट गए, जिससे आर्थिक असंतुलन पैदा हुआ।

सामाजिक रूप से विभाजन ने गहरी सांप्रदायिक अविश्वास उत्पन्न किया। सदियों पुरानी सांस्कृतिक एकता टूट गई। परिवार बिछड़ गए और भावनात्मक घाव पीढ़ियों तक देखे गए।

प्रशासनिक चुनौतियाँ भी बड़ी थीं—फौज, वित्त, रिकॉर्ड, संपत्ति और सरकारी संस्थानों का विभाजन जल्दीबाजी में करना पड़ा जिससे कई समस्याएँ उत्पन्न हुईं।

समग्र रूप से विभाजन ने भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। इसका प्रभाव आज भी भारत–पाकिस्तान संबंधों में दिखाई देता है।