1. विकास की चुनौती
– स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने तीसरी बड़ी चुनौती थी आर्थिक विकास।
– विकास का अर्थ केवल वृद्धि नहीं बल्कि सामाजिक व आर्थिक न्याय भी था।
2. विकास के अलग विचार
– उद्योगपति = कारखाने, आदिवासी = विस्थापन, उपभोक्ता = सस्ती वस्तुएँ।
– आधुनिकीकरण दृष्टि: पश्चिमी औद्योगिक मॉडल अपनाना।
– दो मॉडल: (i) पूंजीवादी (पश्चिम), (ii) समाजवादी (सोवियत संघ)।
3. योजना की शुरुआत
– आम सहमति: केवल निजी पहल पर्याप्त नहीं; राज्य को नेतृत्व करना होगा।
– Bombay Plan (1944): उद्योगपतियों ने भी राज्य हस्तक्षेप का समर्थन किया।
– योजना आयोग (1950): प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में पंचवर्षीय योजनाएँ।
– उद्देश्य: विकास + न्याय।
– 2015 में इसे NITI Aayog से बदला गया।
4. प्रारंभिक पंचवर्षीय योजनाएँ
प्रथम योजना (1951–56):
– कृषि, भूमि सुधार, सिंचाई (भाखड़ा नांगल बांध)।
– लक्ष्य: बचत व आय बढ़ाना।
द्वितीय योजना (1956–61):
– निर्माता: पी.सी. महालनोबिस।
– भारी उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र, समाजवादी पैटर्न (अवाडी अधिवेशन, 1955)।
– उपलब्धियाँ: इस्पात, रेल, बिजली; समस्याएँ: खाद्य संकट, शहरी पक्षपात।
तृतीय योजना (1961–66):
– उद्योग पर ज़ोर; युद्ध व संकट से विफल।
– नतीजा: योजना अवकाश (1966–69)।
5. उपलब्धियाँ व सीमाएँ
उपलब्धियाँ:
– सार्वजनिक क्षेत्र का आधार।
– बुनियादी ढाँचा: बांध, बिजली, परिवहन।
– आत्मनिर्भरता की नींव।
सीमाएँ:
– कृषि की उपेक्षा → खाद्य संकट।
– शहरी पक्षपात → ग्रामीण गरीबी जारी।
– विदेशी तकनीक पर निर्भरता।
– लक्ष्य और परिणाम में अंतर।
6. राजनीतिक विवाद
– कांग्रेस में दो ध्रुव: समाजवाद बनाम निजी पूँजी।
– विरोधाभास: राज्य नियंत्रण बनाम उदारीकरण।
– समाधान: मिश्रित अर्थव्यवस्था।