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Class 12 Political science – contemporary world polities

अध्याय 3: समकालीन दक्षिण एशिया

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (हिंदी, विस्तृत)

प्रश्न 1. स्वतंत्रता के बाद से पाकिस्तान में लोकतंत्र की प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

प्रस्तावना:
1947 में बने पाकिस्तान ने बार-बार चुनी हुई सरकारों और सैन्य शासन के बीच बदलाव देखा। इसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया।

मुख्य भाग:
– बार-बार सैन्य हस्तक्षेप: आयूब खान, याह्या खान, ज़िया-उल-हक और परवेज़ मुशर्रफ जैसे शासकों ने सेना को अंतिम निर्णायक बना दिया।
– कमजोर राजनीतिक दल: दलों में व्यक्तिवाद, टूट-फूट और अस्थिर गठबंधन लोकतंत्र को कमजोर करते रहे।
– नागरिक–सैन्य असंतुलन: रक्षा और भारत नीति पर सेना का नियंत्रण, नागरिक सरकार की सीमित भूमिका।
– धर्म और कट्टरपंथ: राजनीति में धर्म का उपयोग और उग्रवाद ने बहुलवाद को कमजोर किया।
– प्रांत–केंद्र तनाव: बलूचिस्तान की शिकायतें, असमान विकास और आर्थिक संकटों ने लोकतंत्र की नींव कमजोर की।
– न्यायपालिका और जवाबदेही: न्यायपालिका का अस्थिर रुख और राजनीतिक बदले की कार्रवाई ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता घटाई।

निष्कर्ष:
पाकिस्तान में लोकतंत्र की मजबूती के लिए नागरिक सर्वोच्चता, दलों का सशक्तिकरण, प्रांतों की भागीदारी और आर्थिक सुधार आवश्यक हैं।

प्रश्न 2. बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संक्रमण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

प्रस्तावना:
1971 में स्वतंत्र हुए बांग्लादेश ने हत्याओं, तख्तापलट और सैन्य शासन का सामना किया, फिर लोकतंत्र की ओर लौटा।

मुख्य भाग:
– शुरुआती दौर (1971–1975): शेख मुजीबुर्रहमान ने नेतृत्व किया, परंतु आर्थिक कठिनाइयाँ और अस्थिरता रही। 1975 में उनकी हत्या हुई।
– सैन्य शासन (1975–1990): ज़िया-उर-रहमान और एच.एम. इर्शाद का शासन रहा, सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता।
– जनांदोलन और लोकतंत्र की बहाली (1990–1991): जनआंदोलनों से सैन्य शासन समाप्त हुआ और 1991 में संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ।
– द्विदलीय प्रतिस्पर्धा: अवामी लीग और बीएनपी के बीच सत्ता का उतार-चढ़ाव, हड़तालें और आरोप-प्रत्यारोप।
– विकास: राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद बांग्लादेश ने सामाजिक सूचकांकों और अर्थव्यवस्था में प्रगति की।

निष्कर्ष:
बांग्लादेश का अनुभव दिखाता है कि जनआंदोलन, चुनावी संस्थाएँ और विकास लोकतंत्र को स्थिर कर सकते हैं, परंतु शासन और न्यायिक सुधार अभी भी आवश्यक हैं।

प्रश्न 3. श्रीलंका के जातीय संघर्ष और उसमें भारत की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

प्रस्तावना:
श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यक और तमिल अल्पसंख्यक के बीच लंबे समय तक संघर्ष चला।

मुख्य भाग:
– संघर्ष की जड़ें: सिंहला ओनली एक्ट (1956), शिक्षा और नौकरियों में भेदभाव से तमिल असंतोष बढ़ा।
– उग्रवाद का उदय: तमिल राजनीति ने एलटीटीई जैसे सशस्त्र संगठनों का रूप लिया।
– गृहयुद्ध: 1980 के दशक से 2009 तक भीषण संघर्ष चला।
– भारत की भूमिका: 1987 का भारत–श्रीलंका समझौता; भारत ने शांति सेना (IPKF) भेजी लेकिन इसे दोनों पक्षों से विरोध झेलना पड़ा; 1990 में वापसी।
– संघर्ष का अंत: 2009 में श्रीलंकाई सरकार ने एलटीटीई को पराजित किया।

निष्कर्ष:
स्थायी शांति के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकार, सत्ता का बंटवारा और तमिल क्षेत्रों का विकास आवश्यक है। भारत अब मेल-मिलाप और विकास में सहयोग कर रहा है।

प्रश्न 4. नेपाल के राजतंत्र से गणतंत्र बनने की प्रक्रिया का विश्लेषण कीजिए।

प्रस्तावना:
नेपाल ने राजतंत्र से लोकतांत्रिक गणराज्य बनने का सफर जनता के आंदोलनों और शांति समझौते के जरिए तय किया।

मुख्य भाग:
– 1990 जनआंदोलन: पंचायती व्यवस्था समाप्त; संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना।
– माओवादी संघर्ष (1996–2006): गरीबी, असमानता और बहिष्कार के कारण विद्रोह।
– राजतंत्र का प्रत्यक्ष शासन (2005): राजा ज्ञानेंद्र ने सत्ता अपने हाथ में ली; इसका जनविरोध हुआ।
– 2006 शांति समझौता: माओवादी मुख्यधारा में आए, अंतरिम संविधान बना।
– 2008 में राजतंत्र समाप्त; 2015 में नया संविधान लागू हुआ।

निष्कर्ष:
नेपाल का अनुभव दिखाता है कि शांति समझौते, समावेशी संविधान और संघीय ढाँचा संघर्ष समाप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 5. भारत–पाकिस्तान संबंधों के प्रमुख तनाव क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।

प्रस्तावना:
1947 से दोनों देशों के बीच युद्ध, संकट और अविश्वास बना हुआ है।

मुख्य भाग:
– कश्मीर विवाद: 1947–48 और 1965 के युद्ध; नियंत्रण रेखा पर बार-बार उल्लंघन।
– 1971 और कारगिल (1999): 1971 युद्ध से बांग्लादेश का निर्माण; कारगिल संघर्ष ने विश्वास तोड़ा।
– आतंकवाद: संसद हमला (2001), मुंबई हमला (2008) जैसे घटनाएँ।
– सियाचिन और सर क्रीक विवाद: सैन्य और समुद्री सीमाओं को लेकर विवाद।
– सिंधु जल संधि: सामान्य रूप से लागू, लेकिन परियोजनाओं को लेकर विवाद।
– व्यापार और संपर्क: संभावनाओं से कम स्तर पर।

निष्कर्ष:
शांति के लिए सतत संवाद, आतंकवाद पर रोक और आपसी विश्वास बहाली आवश्यक है।

प्रश्न 6. नेपाल में माओवादी आंदोलन के कारण और परिणाम स्पष्ट कीजिए।

प्रस्तावना:
माओवादी विद्रोह (1996–2006) ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।

मुख्य भाग:
– कारण: गरीबी, भूमि समस्या, जातीय बहिष्कार, दलित और मधेसी की उपेक्षा।
– कमजोर सेवाएँ: ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य का अभाव।
– राजनीतिक अस्थिरता: बार-बार सरकार बदलना, भ्रष्टाचार।
– प्रभाव: हजारों मौतें, विस्थापन, ग्रामीण क्षेत्रों में समानांतर शासन।
– शांति समझौता (2006): युद्धविराम, हथियारों की निगरानी, अंतरिम संविधान।
– परिणाम: 2008 में राजतंत्र समाप्त, नया संविधान, संघीय और समावेशी व्यवस्था।

निष्कर्ष:
माओवादी आंदोलन ने नेपाल को पुनर्गठित किया; अब स्थायी शांति के लिए रोजगार और सुशासन जरूरी है।

प्रश्न 7. 1971 के बाद से भारत–बांग्लादेश संबंधों पर चर्चा कीजिए।

प्रस्तावना:
भारत ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता में मदद की; दोनों के संबंध सहयोग और चुनौतियों से भरे रहे।

मुख्य भाग:
– शुरुआती सहयोग: सुरक्षा और पुनर्निर्माण; मित्रता संधि।
– विवाद: अवैध प्रवास, नदी जल बंटवारा (गंगा, तीस्ता), सीमा विवाद।
– उपलब्धियाँ: 2015 भूमि सीमा समझौता, ऊर्जा सहयोग, व्यापार और संपर्क।
– सुरक्षा: भारत-विरोधी उग्रवाद पर नियंत्रण, सीमा प्रबंधन।
– सांस्कृतिक संबंध: साझा भाषा और विरासत, मीडिया और शिक्षा।

निष्कर्ष:
कुछ विवाद शेष हैं, लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सहयोग और विश्वास बढ़ा है।

प्रश्न 8. सार्क क्या है? इसकी उपलब्धियों और सीमाओं का वर्णन कीजिए।

प्रस्तावना:
सार्क (1985) दक्षिण एशियाई देशों का क्षेत्रीय संगठन है, जिसका उद्देश्य सहयोग बढ़ाना है।

मुख्य भाग:
– उद्देश्य: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग; काठमांडू में सचिवालय।
– उपलब्धियाँ: 2006 में सॉफ्टा (SAFTA), स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा प्रबंधन पर परियोजनाएँ, सांस्कृतिक आदान-प्रदान।
– सीमाएँ: भारत–पाकिस्तान विवाद के कारण शिखर सम्मेलन बाधित, आपसी व्यापार 5% से भी कम, सहमति आधारित निर्णय प्रणाली से कार्य धीमा।
– विकल्प: उप-क्षेत्रीय समूह (जैसे BBIN), द्विपक्षीय समझौते।

निष्कर्ष:
सार्क प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, पर वास्तविक सफलता के लिए द्विपक्षीय विवादों को अलग रखना और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना जरूरी है।

प्रश्न 9. दक्षिण एशिया में बाहरी शक्तियों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।

प्रस्तावना:
दक्षिण एशिया की स्थिति और जनसंख्या वैश्विक शक्तियों को आकर्षित करती है।

मुख्य भाग:
– अमेरिका: पाकिस्तान का सहयोगी; 2000 के बाद भारत से संबंध मजबूत।
– चीन: पाकिस्तान का घनिष्ठ सहयोगी; नेपाल, श्रीलंका, मालदीव में निवेश।
– अन्य: जापान, यूरोपीय संघ और रूस की भूमिका।
– प्रभाव: निवेश और तकनीक के अवसर; साथ ही कर्ज संकट, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा।
– भारत की भूमिका: बाहरी प्रभाव को संतुलित करना और पड़ोसी सहयोग को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष:
बाहरी शक्तियाँ दक्षिण एशिया की राजनीति को आकार देती हैं, परंतु क्षेत्रीय एकता ही स्थिरता की कुंजी है।

प्रश्न 10. दक्षिण एशिया में भारत की क्षेत्रीय नेतृत्व भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

प्रस्तावना:
भारत आकार, संसाधन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कारण स्वाभाविक रूप से नेतृत्वकारी है।

मुख्य भाग:
– योगदान: 1971 में बांग्लादेश की मदद, भूटान में विकास, 1988 में मालदीव में हस्तक्षेप, महामारी में सहयोग।
– क्षेत्रीय सार्वजनिक वस्तुएँ: ऊर्जा सहयोग, सड़क–रेल मार्ग, शिक्षा और प्रशिक्षण।
– सार्क और वैकल्पिक समूह: BBIN, हिंद महासागर सहयोग।
– चुनौतियाँ: प्रभुत्व की धारणा, व्यापार असंतुलन, पड़ोसी देशों की राजनीति।
– आगे का मार्ग: परामर्श, रियायती व्यापार, परियोजनाओं का त्वरित क्रियान्वयन।

निष्कर्ष:
भारत की नेतृत्व भूमिका तभी प्रभावी है जब यह सहयोग, संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हो।