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Class 12 Political science – contemporary world polities

शीत युद्ध की समाप्ति और 1990 के दशक की शुरुआत में द्विध्रुवीयता के पतन के बाद, विश्व राजनीति में कई नये क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति केन्द्र उभरे जिन्होंने अमेरिका के वर्चस्व को संतुलित करने और चुनौती देने की क्षमता दिखाई। इनमें यूरोपीय संघ (EU), दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान), चीन की आर्थिक प्रगति, जापान और दक्षिण कोरिया प्रमुख हैं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि क्षेत्रीय सहयोग और आर्थिक विकास किस प्रकार राजनीतिक प्रभाव को जन्म देते हैं।

1. यूरोपीय संघ (EU)
– द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण के प्रयासों से उत्पन्न। मार्शल प्लान (1948) और नाटो की मदद से पुनर्निर्माण हुआ; OEEC (1948) और यूरोप की परिषद (1949) जैसी संस्थाओं ने सहयोग को बढ़ावा दिया।
– धीरे-धीरे आर्थिक एकीकरण से यूरोपीय आर्थिक समुदाय (1957) बना और अंततः 1992 में मास्ट्रिख्ट संधि द्वारा यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।
– आज EU: आर्थिक महाशक्ति (GDP $19+ ट्रिलियन, यूरो एक मजबूत मुद्रा, विश्व व्यापार में अग्रणी हिस्सा), राजनीतिक भूमिका (UN, WTO, जलवायु वार्ता), तथा सैन्य प्रभाव (फ्रांस के परमाणु हथियार, संयुक्त रक्षा खर्च अमेरिका के बाद दूसरा)।
– चुनौतियाँ: आंतरिक मतभेद (ब्रेक्सिट, यूरो-संदेह), सदस्य देशों की संप्रभुता देने की अनिच्छा।

2. दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान)
– 1967 में (बैंकॉक घोषणा) इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड द्वारा स्थापित; बाद में 10 सदस्य बने।
– उद्देश्य: आर्थिक विकास को गति देना, शांति, स्थिरता और सांस्कृतिक प्रगति सुनिश्चित करना।
– आसियान पद्धति (‘ASEAN Way’): अनौपचारिक, सहमति आधारित, और संप्रभुता का सम्मान करने वाली कूटनीति।
– 2003 में आसियान समुदाय की स्थापना – तीन स्तंभ: सुरक्षा, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक।
– सुरक्षा भूमिका: आसियान क्षेत्रीय मंच (1994), संघर्ष समाधान (कंबोडिया, ईस्ट तिमोर)। आर्थिक महत्व: भारत, चीन और अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते; तीव्र वृद्धि ने इसे वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण बनाया।

3. चीन का उदय
– 1949 के बाद सोवियत मॉडल अपनाया: राज्य-नेतृत्व वाली उद्योग प्रणाली, सामूहिक कृषि। 1978 में देंग शियाओपिंग ने सुधार लागू किए – ‘खुला द्वार नीति’, विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ), चरणबद्ध उदारीकरण।
– परिणाम: उच्च वृद्धि, विश्व का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) गंतव्य, विशाल विदेशी मुद्रा भंडार, WTO सदस्यता (2001), और 2040 तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था से आगे निकलने का अनुमान।
– चुनौतियाँ: असमानता (ग्रामीण-शहरी, तटीय-आंतरिक), बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पर्यावरणीय क्षरण।
– प्रभाव: एशियाई विकास का प्रमुख चालक, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में निवेशक, और वैश्विक वित्तीय स्थिरता में योगदानकर्ता (1997 एशियाई संकट)।

4. भारत–चीन संबंध
– ऐतिहासिक रूप से सीमित संपर्क; स्वतंत्रता के बाद ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ की आशा 1962 के सीमा युद्ध से समाप्त हुई।
– 1988 (राजीव गांधी की चीन यात्रा) के बाद संबंधों में सुधार; द्विपक्षीय व्यापार तेज़ी से बढ़ा।
– सहयोग: WTO, ऊर्जा सौदे।
– तनाव: सीमा विवाद, चीन-पाकिस्तान सहयोग (परमाणु और CPEC)। संबंध सहयोग और प्रतिस्पर्धा का मिश्रण बने हुए हैं।

5. जापान और दक्षिण कोरिया
– जापान: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनर्निर्माण, OECD सदस्य (1964), विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, तकनीकी महाशक्ति; अनुच्छेद 9 द्वारा सैन्य रूप से सीमित लेकिन अमेरिका का प्रमुख सहयोगी और G-7 सदस्य।
– दक्षिण कोरिया: ‘हान नदी पर चमत्कार’ (1960–80 के दशक), OECD सदस्य (1996), विश्व की 11वीं अर्थव्यवस्था, तकनीकी केंद्र (सैमसंग, LG, ह्युंडई), उच्च HDI – समान विकास और सुशासन का परिणाम।

प्रमुख बिंदु:
1. क्षेत्रवाद की शक्ति: EU और आसियान दिखाते हैं कि सामूहिक प्रयास शांति और समृद्धि को जन्म देते हैं।
2. चीन का उदय: उदारीकरण ने चीन को एक वैश्विक शक्ति में बदल दिया, जिसने भू-राजनीति को पुनर्गठित किया।
3. भारत की स्थिति: चीन के साथ संतुलन बनाना और आसियान व जापान से संबंध गहरा करना महत्वपूर्ण।
4. समकालीन शक्ति केन्द्र: बहुध्रुवीयता उभर रही है, जिसमें आर्थिक गुट पारंपरिक महाशक्तियों का पूरक या प्रतिरोध कर रहे हैं।