🇮🇳 SECTION D — निबंधात्मक प्रश्न (250 शब्द)
प्र15. आधुनिक बड़े पैमाने पर विनिर्माण उद्योगों की चार विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर (लगभग 250 शब्द): आधुनिक बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्योग तकनीक, पूँजी और संगठनात्मक संरचना केआधार पर पारंपरिक उद्योगों से भिन्न होते हैं।
- पूँजी–प्रधान उद्योग: आधुनिक उद्योगों में मशीनों, स्वचालन, उत्पादन संयंत्रों और अनुसंधान में भारी निवेशकिया जाता है। इन उद्योगों में श्रम की अपेक्षा पूँजी का योगदान अधिक होता है।
- यंत्रीकरण और विशेषीकरण: उत्पादन प्रक्रियाएँ अत्यधिक यंत्रीकृत होती हैं, जहाँ विभिन्न चरणों में विशेषमशीनों का उपयोग किया जाता है। इससे उत्पादन तेज़, सटीक और आर्थिक बनता है।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन: आधुनिक उद्योगों में एक ही उत्पाद का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है, जिससेप्रति इकाई लागत कम होती है और उद्योग वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनते हैं।
- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार: R&D आधुनिक उद्योगों की रीढ़ है। उत्पाद की गुणवत्ता, दक्षता औरबाजार की आवश्यकताओं के अनुसार निरंतर सुधार किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, बड़े पैमाने के उद्योग बेहतरगुणवत्ता नियंत्रण, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, पर्यावरण-अनुकूल तकनीक और कुशल श्रमबल पर आधारित होतेहैं। ये उद्योग आर्थिक विकास, निर्यात वृद्धि और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अथवा
आकार के आधार पर उद्योगों के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर (लगभग 250 शब्द): आकार के आधार पर उद्योगों को तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जाता है—
- लघु उद्योग: इन उद्योगों में पूँजी, श्रम और मशीनरी कम होती है। हस्तशिल्प, वस्त्र, बढ़ईगिरी, घरेलू उत्पादआदि इसके उदाहरण हैं। ये स्थानीय रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं।
- मध्यम उद्योग: ये उद्योग लघु और बड़े उद्योगों के बीच सेतु का कार्य करते हैं। इनमें कुछ स्वचालन, मध्यम पूँजीऔर प्रशिक्षित श्रमिकों का उपयोग होता है। खाद्य प्रसंस्करण, रसायन और इंजीनियरिंग इकाइयाँ इसमेंशामिल हैं।
- महानिर्माण (Large-scale) उद्योग: ये उच्च पूँजी, आधुनिक मशीनरी और व्यापक संगठनात्मक संरचना परआधारित होते हैं। स्टील, पेट्रोकेमिकल, ऑटोमोबाइल और वस्त्र उद्योग इनके प्रमुख उदाहरण हैं। ये राष्ट्रीयऔर अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं। तीनों प्रकार के उद्योग देश की औद्योगिकविविधता, क्षेत्रीय विकास, रोजगार और आर्थिक उन्नति में अहम भूमिका निभाते हैं।
प्र16. भारतीय कृषि की चार समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर (लगभग 250 शब्द): भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से जूझ रही है जो उत्पादन क्षमता और किसानों की आयको प्रभावित करती हैं।
- भूमि का विखंडन: पारिवारिक बँटवारे के कारण खेती योग्य भूमि छोटी-छोटी जोतों में विभाजित होती जातीहै। छोटी जोतों पर आधुनिक तकनीक लागू करना कठिन होता है।
- मानसून पर निर्भरता: देश का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। अनियमित बारिश से सूखा या बाढ़की स्थिति बनती है, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
- प्रौद्योगिकी का सीमित उपयोग: कई किसान आज भी पारंपरिक बीज, उर्वरक और पुराने औज़ारों का प्रयोगकरते हैं। वित्तीय कमी और जानकारी के अभाव के कारण आधुनिक तकनीक अपनाना कठिन होता है।
- सुविधाओं का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण, परिवहन और बाजार ढाँचे की कमी है। इससे किसान उचितमूल्य पर अपनी फसल बेच नहीं पाते। इसके अलावा मिट्टी का क्षरण, जल की कमी, कीट–रोग प्रकोप औरन्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता भी प्रमुख समस्याएँ हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु सिंचाई विस्तार, तकनीकी सहायता, बाज़ार सुधार और किसान-केंद्रित नीतियाँ आवश्यक हैं।
अथवा
भारतीय कृषि के चार प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर (लगभग 250 शब्द): भारत की भौगोलिक विविधता के कारण यहाँ अनेक प्रकार की कृषि पद्धतियाँ पाई जातीहैं—
- सघन निर्वाह कृषि: छोटे खेत, अधिक श्रम और पारिवारिक श्रमिक बल पर आधारित है। इसमें मुख्य रूप सेचावल, गेहूँ, दालें आदि उगाई जाती हैं।
- व्यावसायिक कृषि: इसमें कपास, गन्ना, चाय, कॉफी जैसी नकदी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।आधुनिक मशीनरी, उन्नत बीज और रासायनिक उर्वरक उपयोग होते हैं।
- झूम कृषि (स्थानांतरित खेती): पूर्वोत्तर राज्यों में प्रचलित है। किसान जंगल साफ़ कर सीमित समय के लिएखेती करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।
- बागान (Plantation) कृषि: बड़े-बड़े खेतों में एक ही फसल जैसे चाय, रबर, कॉफी की खेती होती है। यहनिर्यात-उन्मुख, पूँजी-प्रधान और श्रम-प्रधान होती है। ये सभी कृषि प्रकार भारत की सामाजिक, आर्थिक औरजलवायु विविधताओं को दर्शाते हैं।