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Geography
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Previous Year Paper – Class 12 RBSE 2025

SECTION D — हिंदी (250 शब्द के निबंधात्मक उत्तर)

प्र18. “नमक के एकाधिकार का विरोध करना गांधीजी की रणनीतिक बुद्धिमत्ता का उत्कृष्ट उदाहरण था।”—इस कथन की विवेचना कीजिए।

उत्तर (लगभग 250 शब्द):

गांधीजी द्वारा 1930 में नमक कानून को चुनौती देना उनकी अद्भुत रणनीतिक बुद्धिमत्ता का प्रमाण था। नमक हर व्यक्ति की आवश्यकता थी—गरीब, अमीर, ग्रामीण, शहरी, स्त्री, पुरुष—सभी इसका उपयोग करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस पर कर लगाकर आम जनता का शोषण किया था। गांधीजी ने समझा कि यदि आंदोलन को व्यापक बनाना है, तो ऐसा मुद्दा चुनना होगा जिससे देश का हर नागरिक भावनात्मक रूप से जुड़ सके।

दांडी मार्च के माध्यम से 240 मील की पैदल यात्रा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी ध्यान आकर्षित किया। दांडी समुद्र तट पर नमक बनाना एक सरल, अहिंसक, लेकिन अत्यंत प्रतीकात्मक कार्य था। इससे सामान्य भारतीय को पहली बार लगा कि वह भी ब्रिटिश कानून का शांतिपूर्वक उल्लंघन कर सकता है।

नमक सत्याग्रह में महिलाओं, छात्रों, किसानों और मजदूरों की भागीदारी अभूतपूर्व थी। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नैतिक कमजोरी उजागर कर दी और भारत की एकता तथा आत्मविश्वास को मजबूत किया।

गांधीजी ने एक साधारण वस्तु को राष्ट्रीय प्रतिरोध का शक्तिशाली प्रतीक बना दिया। यही उनकी रणनीतिक बुद्धिमत्ता थी—सरल मुद्दे को जन-आंदोलन में बदल देना।

व्याख्या:

नमक सार्वभौमिक, भावनात्मक और प्रतीकात्मक मुद्दा था; इसलिए यह गांधीजी की रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण बना।

अथवा (OR)

“रॉलेट सत्याग्रह ने गांधीजी को एक सच्चा राष्ट्रीय नेता बना दिया।”—इस कथन की विवेचना कीजिए।

उत्तर (लगभग 250 शब्द):

1919 का रॉलेट सत्याग्रह गांधीजी का पहला सर्वभारतीय आंदोलन था, जिसने उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया। रॉलेट एक्ट बिना मुकदमे के गिरफ्तारी की अनुमति देता था, जिसे भारतवासियों ने स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर कठोर प्रहार माना। गांधीजी ने अहिंसक प्रतिवाद के लिए राष्ट्रव्यापी हड़ताल और सत्याग्रह का आह्वान किया।

देशभर में हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों ने एक साथ भाग लिया—बंबई, दिल्ली, पंजाब, बंगाल आदि में विशाल प्रदर्शन हुए। पहली बार जनता ने गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता दिखाई।

यद्यपि कुछ स्थानों पर हिंसा हुई और जलियाँवाला बाग जैसी त्रासदी घटी, लेकिन इस आंदोलन ने गांधीजी को नैतिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर भारत का प्रमुख नेता बना दिया। ब्रिटिश शासन की क्रूरता उजागर हुई, और स्वतंत्रता की माँग तेज हो गई।

रॉलेट सत्याग्रह ने यह सिद्ध कर दिया कि गांधीजी सामूहिक चेतना को जगाने और पूरे देश को एकजुट करने की क्षमता रखते हैं।

व्याख्या:

यह गांधीजी का पहला अखिल भारतीय आंदोलन था जिसने उन्हें जन-नेता के रूप में स्थापित किया।

प्र19. जैन दर्शन की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर (लगभग 250 शब्द):

जैन दर्शन महावीर और अन्य तीर्थंकरों की शिक्षाओं पर आधारित है। इसका केंद्रीय सिद्धांत अहिंसा है, जिसे सर्वोच्च नैतिक मूल्य माना गया है। जैन धर्म के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक भी जीवित हैं; इसलिए किसी भी जीव को चोट पहुँचाना पाप माना जाता है।

दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत अनेकांतवाद है, जिसके अनुसार सत्य अनेक रूपों में समझा जा सकता है और किसी एक दृष्टिकोण से पूर्ण सत्य की प्राप्ति संभव नहीं। यह सिद्धांत सहिष्णुता, विनम्रता और अन्य मतों के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न करता है।

अपरिग्रह (वैराग्य) भी जैन धर्म का एक मूल तत्व है, जिसमें अनावश्यक वस्तुओं और इच्छाओं का त्याग करने पर बल दिया जाता है। सत्य, अस्तेय, और ब्रह्मचर्य जैसे व्रत नैतिक जीवन का मार्गदर्शन करते हैं।

जैन धर्म में ब्रह्मांड शाश्वत माना गया है और मोक्ष आत्मशुद्धि, तप, सही ज्ञान, सही श्रद्धा और सही आचरण—इन ‘तीन रत्नों’ के माध्यम से प्राप्त होता है। साधु-साध्वियाँ कठोर अनुशासन का पालन करते हैं, जबकि गृहस्थ सरल रूप में इन्हीं सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं।

इस प्रकार, जैन दर्शन एक अहिंसक, अनुशासित और नैतिक जीवन का मार्ग प्रस्तुत करता है।

व्याख्या:

जैन दर्शन अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और नैतिक जीवन पर आधारित है।

अथवा (OR)

स्तूपों की खोज कैसे की गई? वर्णन कीजिए।

उत्तर (लगभग 250 शब्द):

भारत में अधिकांश प्राचीन स्तूपों की खोज 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा की गई। पहले ये स्थल सामान्य मिट्टी के टीले प्रतीत होते थे, लेकिन स्थानीय लोग इनके ऐतिहासिक महत्व से अनजान थे। अलेक्ज़ेंडर कनिंघम जैसे पुरातत्वविदों ने अभिलेखों, मूर्तियों और बौद्ध ग्रंथों के आधार पर इन स्थलों की पहचान की।

सांची, भरहुत, अमरावती जैसे स्थलों पर खुदाई की गई, जहाँ रेलिंग, तोरण, बुद्ध प्रतिमाएँ और दानदाताओं के अभिलेख मिले। इससे स्पष्ट हुआ कि ये स्थल प्रारंभिक बौद्ध काल से संबंधित थे। कुछ स्तूप, जैसे सांची का महान स्तूप, काफी संरक्षित मिले, जबकि कई केवल टीले के रूप में बचे थे।

खुदाई में अवशेष-कलश, सिक्के, उत्कीर्ण पत्थर और मूर्तिकला प्राप्त हुई, जिन्होंने बौद्ध कला और इतिहास को समझने में मदद की। साथ ही चीनी यात्रियों—ह्वेनसांग और फाह्यान—के वर्णनों ने भी इन स्थलों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार, स्तूपों की खोज उत्खनन, अभिलेख अध्ययन और ग्रंथों की तुलना के संयुक्त प्रयास से संभव हुई।

व्याख्या:

स्तूप उत्खनन, अभिलेख, मूर्तिकला और बौद्ध ग्रंथों की तुलना से पहचाने गए।