🏛️ विषय 4 – विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास (ई.पू. 600 – ई. 600)
यह अध्याय भारतीय सभ्यता के लगभग एक हजार वर्षों के दार्शनिक, धार्मिक और कलात्मक विकास का अध्ययन करता है।
मुख्य रूप से यह बौद्ध धर्म पर केंद्रित है, लेकिन साथ ही जैन धर्म, उपनिषदों के विचार, और हिंदू मंदिर स्थापत्य का भी विश्लेषण करता है।
सांची जैसे पुरातात्विक स्थलों के उदाहरण से यह दिखाया गया है कि किस प्रकार विचार और विश्वास ग्रंथों, स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला मेंअभिव्यक्त हुए।
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🕍 1. सांची का स्तूप: प्रारंभिक बौद्ध धर्म की झलक
— सांची (मध्य प्रदेश) का स्तूप भारत के सबसे सुंदर और सुरक्षित बौद्ध स्थलों में से एक है।
— इसका पुनःअविष्कार 19वीं सदी में हुआ और इसे अलेक्जेंडर कनिंघम जैसे पुरातत्वविदों ने अध्ययन किया।
— भोपाल की बेगमें – शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम ने इसके संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता दी।
— जॉन मार्शल ने पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्गत इसके संरक्षण को सुनिश्चित किया।
— आज यह स्थल प्राचीन भारतीय स्थापत्य और संरक्षण की उत्कृष्ट मिसाल है।
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🔥 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विचार-विमर्श
— ई.पू. प्रथम सहस्राब्दी के मध्य में विश्वभर में दार्शनिक उभार हुआ —
ईरान में ज़रथुस्त्र, चीन में कन्फ्यूशियस, यूनान में सुकरात और भारत में महावीर और बुद्ध जैसे विचारक उभरे।
— भारत में उस समय वैदिक यज्ञ परंपरा प्रचलित थी — लोग अग्नि, इंद्र, सोम आदि देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते थे।
— बाद में उपनिषदों में इन यज्ञों की उपयोगिता पर प्रश्न उठाया गया और आत्मा (आत्मन), परम सत्य (ब्रह्म), कर्म और पुनर्जन्म परचिंतन किया गया।
— यह काल दार्शनिक वाद-विवाद और संवाद का युग था — बौद्ध ग्रंथों में 64 दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख मिलता है।
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🕊️ 3. सांसारिक सुखों से परे: महावीर का संदेश
— वर्धमान महावीर (ई.पू. 6वीं शताब्दी) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
— जैन दर्शन के अनुसार सृष्टि की हर वस्तु — पत्थर, जल, पौधे — में जीवन (जीव) है।
— इसका मुख्य सिद्धांत अहिंसा है — किसी भी जीव को हानि न पहुँचाना।
— जैन भिक्षु और भिक्षुणियाँ पाँच व्रतों का पालन करते थे — न मारना, न चोरी करना, न झूठ बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन और संपत्तिका त्याग।
— मुक्ति (मोक्ष) केवल संयम और संन्यास द्वारा प्राप्त की जा सकती थी।
— जैन धर्म ने भारत में व्यापक प्रसार पाया और प्राकृत, संस्कृत और तमिल में विपुल साहित्य रचा गया।
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🪶 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज
— सिद्धार्थ गौतम, शाक्य कुल के एक राजकुमार थे।
— वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु देखकर उन्होंने संसार की नश्वरता को समझा और सत्य की खोज में राजमहल छोड़ दिया।
— गहन ध्यान के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे “बुद्ध” (ज्ञान प्राप्त करने वाले) कहलाए।
— उन्होंने धम्म (धार्मिक मार्ग) सिखाया जिससे मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर निर्वाण (निब्बान) प्राप्त कर सकता है।
— बुद्ध ने जाति-भेद और यज्ञों का विरोध किया तथा नैतिक आचरण और करुणा पर बल दिया।
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📜 5. बुद्ध के उपदेश
— बौद्ध दर्शन के अनुसार –
— संसार अनित्य (अनिच्च) है,
— आत्मा शून्य (अनात्म) है, और
— दुःख (दुक्ख) जीवन का अंग है।
— मुक्ति मध्यम मार्ग (Middle Path) द्वारा मिलती है — न अत्यधिक भोग, न कठोर तप।
— चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग बुद्ध के शिक्षण का सार हैं।
— उन्होंने सिखाया कि मुक्ति ईश्वर की कृपा से नहीं, बल्कि स्वयं के प्रयास और नैतिकता से मिलती है।
— उनके अंतिम शब्द थे: “अप्प दीपो भव – अपने दीपक स्वयं बनो।”
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🧘♀️ 6. बुद्ध के अनुयायी और संघ
— संघ बौद्ध भिक्षुओं (भिक्खु) और भिक्षुणियों (भिक्खुनी) का संगठन था।
— सदस्य भिक्षा पर निर्भर रहते थे और विनय पिटक में दिए गए नियमों का पालन करते थे।
— प्रारंभ में केवल पुरुषों को प्रवेश मिला, बाद में महाप्रजापति गौतमी (बुद्ध की पालक माता) पहली महिला भिक्षुणी बनीं।
— संघ में सभी जाति-वर्गों के लोग शामिल हुए — राजाओं से लेकर दासों तक।
— संघ के निर्णय परामर्श और सहमति से लिए जाते थे — यह लोकतांत्रिक परंपरा का आरंभिक उदाहरण था।
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🪔 7. स्तूप: वास्तुकला और प्रतीकवाद
— स्तूप (संस्कृत में ‘ढेर’) वे पवित्र टीले थे जिनमें बुद्ध के अवशेष या वस्तुएँ रखी जाती थीं।
— इसका आरंभ बौद्ध धर्म से पहले हुआ, परंतु अशोक ने इसे बौद्ध प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
— संरचना:
— अंड (गोल गुंबद) – ब्रह्मांड का प्रतीक
— हार्मिका (चौकोर छतरी) – स्वर्ग का प्रतीक
— यष्टि और छत्र – सम्मान और आश्रय का प्रतीक
— तोरण और रेलिंग – पवित्र और लौकिक क्षेत्र की सीमा
— स्तूपों का निर्माण राजाओं, व्यापारी संघों, भिक्षुओं और आम स्त्री-पुरुषों द्वारा दान से हुआ।
— परिक्रमा (प्रदक्षिणा) ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक मानी जाती थी।
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🏺 8. स्तूपों की खोज और संरक्षण
— अमरावती और सांची के स्तूपों की खोज 18वीं–19वीं सदी में हुई।
— ब्रिटिश अधिकारियों ने मूर्तियाँ हटाकर लंदन, कोलकाता और मद्रास भेज दीं।
— पुरातत्वविद एच.एच. कोल ने इसका विरोध किया और स्थल पर संरक्षण (in situ preservation) की नीति सुझाई।
— सांची इसलिए बच गया क्योंकि स्थानीय शासकों और ASI ने इसे संरक्षित रखा, जबकि अमरावती की मूर्तियाँ विदेश चली गईं।
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🪷 9. मूर्तिकला और प्रतीक
— शिलाओं में कथाएँ (Jataka Tales) – जैसे —वेस्संतर जातक — की कथा तोरणों पर उकेरी गई।
— प्रारंभिक काल में बुद्ध को मानव रूप में नहीं दिखाया गया —
— खाली आसन = ध्यान,
— वृक्ष = बोधि वृक्ष,
— धर्मचक्र = पहला उपदेश,
— स्तूप = निर्वाण।
— लोक प्रतीक जैसे —शालभंजिका (वृक्ष से झूलती स्त्री) — उर्वरता का प्रतीक थे।
— हाथी, घोड़े और पक्षियों की मूर्तियाँ लोक आस्था और कलात्मक जीवंतता को दर्शाती हैं।
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🕉️ 10. नए धार्मिक परंपराएँ
(क) महायान बौद्ध धर्म
— ई. 1वीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म दो मार्गों में विभाजित हुआ –
— महायान (“महान वाहन”) – बुद्ध और बोधिसत्त्वों की पूजा को मान्यता दी।
— हीनयान / थेरवाद (“लघु वाहन”) – आत्मज्ञान और व्यक्तिगत मुक्ति पर बल।
— महायान ने करुणा (Karuna) और भक्ति के माध्यम से मुक्ति पर जोर दिया।
(ख) पुराणिक हिंदू धर्म
— समानांतर रूप से वैष्णववाद और शैववाद का विकास हुआ।
— विष्णु और शिव को व्यक्तिगत उपास्य देवता के रूप में पूजने की परंपरा विकसित हुई।
— अवतारवाद (जैसे वराह, कृष्ण आदि) ने विभिन्न स्थानीय देवताओं को एकीकृत किया।
— भक्ति आंदोलन का आरंभिक स्वरूप उभरा — प्रेम और समर्पण पर आधारित उपासना।
— प्रारंभिक मंदिर छोटे गर्भगृह (Garbhagriha) से बने होते थे; बाद में शिखर, सभा-मंडप और प्रवेशद्वार (तोरण) जोड़े गए।
— बाराबर गुफाएँ और बाद में एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर इस स्थापत्य विकास के उदाहरण हैं।
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🎨 11. कला, स्थापत्य और इतिहास की समझ
— मूर्तियाँ, मंदिर और चित्र (जैसे अजंता की गुफाएँ) धार्मिक विचारों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करते हैं।
— चित्रों में जातक कथाएँ, राजदरबार, त्यौहार और देवी-देवता जैसे गजलक्ष्मी दर्शाई गई हैं।
— आरंभिक यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय कला को ग्रीक शैली से तुलना कर गलत समझा; उन्होंने गंधार कला को श्रेष्ठ माना।
— बाद में भारतीय कला की मौलिकता को स्वीकार किया गया।
— बहुत-सी धार्मिक परंपराएँ ग्रंथों या मूर्तियों में नहीं, बल्कि मौखिक और अनुष्ठानिक रूप में विद्यमान थीं।
— जो आज बचा है, वह केवल भारत की समृद्ध आध्यात्मिक धरोहर का एक अंश है।
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🪶 मुख्य निष्कर्ष (Key Takeaways)
— ई.पू. 600 से ई. 600 तक भारत में वैदिक, बौद्ध, जैन और प्रारंभिक हिंदू परंपराओं का गहन संवाद हुआ।
— ध्यान और तप से लेकर भक्ति और करुणा तक — धार्मिक विचार विविध दिशाओं में विकसित हुए।
— बौद्ध और जैन धर्म ने नैतिकता और समानता को प्राथमिकता दी।
— स्तूप और मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ कला और स्थापत्य के उत्कर्ष का प्रतीक बने।
— यह काल भारत की सहिष्णुता, रचनात्मकता और बौद्धिक संवाद की परंपरा का आधार बना।